(राग कान्हरौं)
देखि देखि फूल भई।
प्रेम के प्रकास प्रीति के आगैं ह्वै जु लई॥[1]
सुनि री सखी बागौ बन्यौ आजु
तुम पर तृन टूटत है जु नई।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
सकल गुन निपुन ताताथेई ताथेई गति जु ठई ॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (30)
श्री बिहारी-बिहारिनी जी के अंग अंग में पुष्पों का शृंगार है जो महा आनन्द का प्रकाश फैल रहा है । ललिता सखी हरिदास जी सखीजन सभी फूलों के शृंगार को निहार फूल रही हैं।
श्री स्वामिनी जी आज बहुत कृपाल हैं, प्रेम रस केली विलास को उत्सुक हैं, जिसकी चाह जान कर श्री लाल जी ने अपनी प्रीति भी उसी में मिलाकर कहा कि आज हम दोनों प्रेम का प्रकाश करते हैं । [1]
इसी प्रसन्नता में पिय ने उन्हें एक लंबे अदभुत पहनावा 'बागौ' [दुल्हन का पहनावा] को पहना दिया है ।श्री राधिका ज़ू सखी से कहती हैं: “सुनो सखी, आज लालजी ने 'बागौ' पहनाया हमें”। इसे देख [श्री राधा को अत्यंत सुखी देख] सखियाँ अपना सर्वस्व श्री राधिका ज़ू पर बलिहार करती हैं । श्री हरिदास जी की दिव्य दम्पति श्री श्यामा कुंज बिहारी समस्त गुणों में निपुण हैं, अत: वह “ता....ता...थई” कर नृत्य करने लगे । [2]
देखि देखि फूल भई।
प्रेम के प्रकास प्रीति के आगैं ह्वै जु लई॥[1]
सुनि री सखी बागौ बन्यौ आजु
तुम पर तृन टूटत है जु नई।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
सकल गुन निपुन ताताथेई ताथेई गति जु ठई ॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (30)
श्री बिहारी-बिहारिनी जी के अंग अंग में पुष्पों का शृंगार है जो महा आनन्द का प्रकाश फैल रहा है । ललिता सखी हरिदास जी सखीजन सभी फूलों के शृंगार को निहार फूल रही हैं।
श्री स्वामिनी जी आज बहुत कृपाल हैं, प्रेम रस केली विलास को उत्सुक हैं, जिसकी चाह जान कर श्री लाल जी ने अपनी प्रीति भी उसी में मिलाकर कहा कि आज हम दोनों प्रेम का प्रकाश करते हैं । [1]
इसी प्रसन्नता में पिय ने उन्हें एक लंबे अदभुत पहनावा 'बागौ' [दुल्हन का पहनावा] को पहना दिया है ।श्री राधिका ज़ू सखी से कहती हैं: “सुनो सखी, आज लालजी ने 'बागौ' पहनाया हमें”। इसे देख [श्री राधा को अत्यंत सुखी देख] सखियाँ अपना सर्वस्व श्री राधिका ज़ू पर बलिहार करती हैं । श्री हरिदास जी की दिव्य दम्पति श्री श्यामा कुंज बिहारी समस्त गुणों में निपुण हैं, अत: वह “ता....ता...थई” कर नृत्य करने लगे । [2]

