फूलन सौं सोहत अति स्यामा सुकुमारी - श्री नागरीदेव जी

फूलन सौं सोहत अति स्यामा सुकुमारी - श्री नागरीदेव जी

(राग विहागरौ)
फूलन सौं सोहत अति स्यामा सुकुमारी। [1]
फूलन को साज समाज आज बन्यौ,
फूल सौं लड़ावत रसिक-बिहारी॥ [2]
फूली जहाँ-तहाँ कुञ्ज, मधुप करत गुंज,
फूले जस गावत कोकिल सुक सारी। [3]
श्रीनागरीदासि वारी, फूले फिरत बिहारी,
फूली छबि देखि सखी जात बलिहारी॥ [4]

- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, श्रिंगार रस के पद (31)
 
आनन्दोल्लास से भरी-पूरी श्रीश्यामा-सुकुमारी पुष्प-शृङ्गार (प्रफुल्लता) से सज-सँभलकर आज बहुत अच्छी लग रही हैं। [1]

फूलों (प्रफुल्लताओं) की साड़ी-चोली और फूलों (प्रफुल्लताओं) के ही सारे आभूषण उन्होंने अपने श्री अंगों में धारण कर रखे हैं । रसिक शिरोमणि श्री बाँके बिहारी भी उन्हें पुष्पों ( प्रफुल्लता) से ही लाड़ लड़ा रहे हैं । [2]

इस छवि का अवलोकन कर कुज-निकुजों की समस्त लतिकायें फूल उठी हैं, भौरे प्रफुल्लता से गुजार करने लगे हैं तथा प्रफूल्लित कोयले और शुक-सारिकाय प्रिया-प्रियतम के इस रस-यश को गाने लगी हैं । [3]

नवेली प्रिया की फूलन को निहारकर श्रोबिहारी जी महाराज फूले फूले फिर रहे हैं। श्यामा-कुजविहारी की इस जोड़ी की प्रफुल्लतामयी छवि-माधुरी का आस्वादन कर आनन्द में भरी सखियाँ बलिहारी जा रही हैं । स्वामी नागरीदास जी जो इस समग्र शोभा का अवलोकन कर रहे हैं, स्वयं भी इस पर न्यौछावर हैं। [4]