प्रीति न भली भजन बिन और।
कहा कहों काहू सुख पायो एक मन धरि द्वै ठौर ।। [1]
श्रीबिहारीबिहारनि के चरनकमल तजि अनत देत चित तेव महामति बौर।
‘श्रीबिहारीदास’ थोरे मन उबिट्यौ कृपा करी सिरमौर ।। [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (173)
भजन के अतिरिक्त कहीं और प्रीति करना जीव की भलाई नहीं है । ऐसा कौन है जो एक मन को दो ठौर [जगह] लगाकर सुख प्राप्त कर सका है [ठौर अर्थात या तो संसार की भक्ति होगी या भगवान की, दोनों की एक साथ भक्ति असम्भव है] ? [1]
परम कृपाल श्री बिहारी बिहारिनी के चरण कमल को त्याग कर जो जन अपने चित्त को कहीं और देते हैं वे इस संसार में महान मूर्ख हैं । श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि रसिक शिरोमणि ललित अवतार श्री स्वामी हरिदास जी की कृपा से शीघ्र ही उनका मन इस संसार से ऊब [थक] गया है । [2]
कहा कहों काहू सुख पायो एक मन धरि द्वै ठौर ।। [1]
श्रीबिहारीबिहारनि के चरनकमल तजि अनत देत चित तेव महामति बौर।
‘श्रीबिहारीदास’ थोरे मन उबिट्यौ कृपा करी सिरमौर ।। [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (173)
भजन के अतिरिक्त कहीं और प्रीति करना जीव की भलाई नहीं है । ऐसा कौन है जो एक मन को दो ठौर [जगह] लगाकर सुख प्राप्त कर सका है [ठौर अर्थात या तो संसार की भक्ति होगी या भगवान की, दोनों की एक साथ भक्ति असम्भव है] ? [1]
परम कृपाल श्री बिहारी बिहारिनी के चरण कमल को त्याग कर जो जन अपने चित्त को कहीं और देते हैं वे इस संसार में महान मूर्ख हैं । श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि रसिक शिरोमणि ललित अवतार श्री स्वामी हरिदास जी की कृपा से शीघ्र ही उनका मन इस संसार से ऊब [थक] गया है । [2]

