प्रीतिरिव मूर्तिमती रससिन्धोः सारसम्पदिव विमला ।
वैदग्धीनां हृदयं काचन वृन्दावनाधिकारिणी जयति ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (199)
मूर्तिमान प्रीति जैसी, रस-समुद्र की सार-सम्पत्ति की भाँति निर्मल और चतुरता की सर्वस्व कोई अनिर्वचनीया श्रीवृन्दावन-स्वामिनी की जय हो।
वैदग्धीनां हृदयं काचन वृन्दावनाधिकारिणी जयति ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (199)
मूर्तिमान प्रीति जैसी, रस-समुद्र की सार-सम्पत्ति की भाँति निर्मल और चतुरता की सर्वस्व कोई अनिर्वचनीया श्रीवृन्दावन-स्वामिनी की जय हो।

