बांह छुड़ाकर जात हो - श्री सूरदास

बांह छुड़ाकर जात हो - श्री सूरदास

बांह छुड़ाकर जात हो, निबल जान के मोहि।
हिरदै से जब जाइगो, मर्द बदौंगो तोहि॥

- श्री सूरदास

हे श्यामसुंदर! मुझे निर्बल जानकर मेरी बाहें छुड़ाकर जा रहे हो; हिम्मत हो तो मेरे हृदय से निकलकर दिखाओ, तब तुम्हें मर्द मानूँ। (यह प्रेमपूर्ण व्यंग्य है।)