जो पै सोचेहु इतनी कृपा प्यारी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (293)

जो पै सोचेहु इतनी कृपा प्यारी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (293)

जो पै सोचेहु इतनी कृपा प्यारी ।
तौ किन देत प्रीति हिय गाढ़ी, कृपासिंधु वृषभानु दुलारी ।। [1]
जो पै ऐसी रीति रावरी, दीन अधीन सकहु न बिसारी ।
तौ किन ऐसौ करौ मन मेरौ, छिन न तजौं पद कंज सुखारी ।। [2]
जो पै सत्य कृपा कछु मोपै, मेटहु कृपा करि हिय भ्रम भारी ।
सहज कृपालु करहु अस 'भोरी', जयौं देखैं भरि नयन छटा री ।। [3]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (293)

हे प्यारी जू ! यदि आप मुझ पर थोड़ी सी कृपा करने की बात को अपने मन में सोच रही हो, तो हे वृषभानुनंदिनी ! आपके हृदय में तो कृपा का समुद्र हिलोरे ले रहा है, फिर मुझे आपके प्रति गहरी प्रीति का कृपा - प्रसाद ही क्यों नहीं दे देती हो ? [1]

यदि आपके ऐसे ही रीति है की आप असहाय एवं शरण में आये जनो को कभी नहीं भूलती हो, तो फिर आप मेरे मन को ऐसा क्यों नहीं बना देती हो की वह आपसे परम सुखदायी चरण - कमलो को एक क्षण के लिए भी नहीं छोड़े, उन्हें दृंढता से पकड़ ले । [2]

यदि आपकी मुझ पर थोड़ी सी कृपा वाली बात सत्य है, तो फिर आप कृपा करके मेरे हृदय के समस्त भ्र्म का भंजन क्यों नहीं कर देती ? श्रीहित भोरी सखी जी निवेदन करती है कि सहज रूप से कृपा करने वाली हे मेरी स्वामिनी ! आप तो मुझे ऐसा बना दो, जिससे की मुझे आपकी अनुपम छटा को अपने नेत्रों में भर-भरकर देखने का सुअवसर मिल जाय । [3]