जाकौं नेति नेति कहि वेदन बखानै भेद - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (56)

जाकौं नेति नेति कहि वेदन बखानै भेद - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (56)

जाकौं नेति नेति कहि वेदन बखानै भेद,
नारद न जाने नहीं काहू ठीक पारो है। [1]
संभु सुर सुरपति सुक मुनि आदि दै कै,
करि जोग जग्य जप तप तन गारो है॥ [2]
हठी की आधार वृषभान की कुमारि ऐसी,
तीन लोक जाकी कृपा कोर को पसारो है। [3]
चार मुख वारो विधि कहै का बिचारो,
दससतमुख वारी राधा गुन कहि हारो है॥ [4]

- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (56)

जिसे वेद "नेति नेति" कहकर वर्णन करते हैं, जिसे स्वयं श्री नारद जी भी पूरी तरह नहीं जानते, और ऐसा कोई दावा नहीं कर सकता कि उसने उसका संपूर्ण रहस्य जान लिया है। [1]

शिवजी, देवता, इंद्र, शुकदेव, और मुनिजन योग, यज्ञ, जप, और तपस्या द्वारा जिसे जानने का प्रयास कर रहे हैं, परंतु वह अब भी उनकी समझ से परे है। [2]

श्री हठी जी कहते हैं कि मेरी एकमात्र आश्रय श्री किशोरीजी (श्री राधा रानी) हैं, जिनकी कृपा पाने की लालसा तीनों लोकों में हर किसी को है। [3]

चार मुख वाले ब्रह्मा जी श्री राधा रानी का वर्णन कहाँ तक कर सकते हैं, जब स्वयं एक हजार मुख वाले शेषनाग भी उनके गुणगान करते-करते थक गए। [4]