रे मूढ़ गूढ़मखिलोपनिषत् स्वगाढ़ - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (12.62)

रे मूढ़ गूढ़मखिलोपनिषत् स्वगाढ़ - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (12.62)

रे मूढ़ गूढ़मखिलोपनिषत् स्वगाढ़- प्रेन्मावगाढ़मखिलार्थ शिरोऽधिरूढ़म्।
आनन्दसिन्धु मन पाश्रय दीनबन्धुं वृन्दावनं व्रज हठौत् कलितात्मबन्धः।।

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (12.62)

अरे मूर्ख चित्त मनुष्य! समस्त उपनिषदों से जो गुप्त है और अपने गाढ़ प्रेम से जो प्राप्त होने वाले हैं, समस्त पुरुषार्थों में शिरोमणि है आनन्दसागर परमाश्रय तथा दीनबन्धु इस श्रीवृन्दावन के लिये बलपूर्वक अपने बन्धनों को तोड़कर प्रस्थान कर।