(राग केदारौ)
नव बन नव निकुंज नव बाला ।
नव रंग रसिक रसिलौ मोहन बिलसत कुंजबिहारी लाला ।। [1]
नव मराल जित अवनि धरत पग कूजित नूपुर किंकिनि जाला ।
श्री बीठल बिपुल बिनोद बिहारी के उर यों राजत जैसे चंपे की माला ।। [2]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, विट्ठल विपुल देव जू की बानी (35)
नित नव-नव शोभा से सज्जित वृन्दावन है और नित नये-नये रस-विलास के लिये प्रस्तुत इसकी निकुञ्ज हैं। नित नव किशोर-मुलन प्रेम की उमङ्ग में पगी सुन्दरी श्यामा है और नित नव रस के रसिक रसिक-हृदय सुन्दर श्याम हैं ऐसे श्यामा कुञ्जविहारी नित्य ही यहाँ विलसते रहते हैं । [1]
हंस की सी गति से चलते हुये पृथ्वी पर जब ये पग रखते हैं तो नूपुर और किंकणी की घंटिकाएँ झुनुक झुनुक कर बज उठती हैं। गलबहियां दिये प्रियालाल की इस शोभा को निरख श्री विट्ठल विपुल देवजी कह उठते हैं कि आज तो श्रीप्रियाजी श्री लाल जी के उर पर चंपे की माला-सी सुशोभित हो रही हैं। [2]
नव बन नव निकुंज नव बाला ।
नव रंग रसिक रसिलौ मोहन बिलसत कुंजबिहारी लाला ।। [1]
नव मराल जित अवनि धरत पग कूजित नूपुर किंकिनि जाला ।
श्री बीठल बिपुल बिनोद बिहारी के उर यों राजत जैसे चंपे की माला ।। [2]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, विट्ठल विपुल देव जू की बानी (35)
नित नव-नव शोभा से सज्जित वृन्दावन है और नित नये-नये रस-विलास के लिये प्रस्तुत इसकी निकुञ्ज हैं। नित नव किशोर-मुलन प्रेम की उमङ्ग में पगी सुन्दरी श्यामा है और नित नव रस के रसिक रसिक-हृदय सुन्दर श्याम हैं ऐसे श्यामा कुञ्जविहारी नित्य ही यहाँ विलसते रहते हैं । [1]
हंस की सी गति से चलते हुये पृथ्वी पर जब ये पग रखते हैं तो नूपुर और किंकणी की घंटिकाएँ झुनुक झुनुक कर बज उठती हैं। गलबहियां दिये प्रियालाल की इस शोभा को निरख श्री विट्ठल विपुल देवजी कह उठते हैं कि आज तो श्रीप्रियाजी श्री लाल जी के उर पर चंपे की माला-सी सुशोभित हो रही हैं। [2]

