मोहि वास सदा वृन्दावन कौं - ब्रज के सवैया

मोहि वास सदा वृन्दावन कौं - ब्रज के सवैया

मोहि वास सदा वृन्दावन कौं, नित उठ यमुना पुलिन नहाऊँ। [1]
गिरि गोवर्द्धन की दे परिक्रमा, दर्शन कर जीवन सफल बनाऊँ॥ [2]
सेवाकुञ्ज की करुँ आरती, व्रज की रज में ही मिल जाऊँ। [3]
ऐसी कृपा करौ श्रीराधे, वृन्दावन छोड़ बाहर न जाऊँ॥ [4]

- ब्रज के सवैया

हे श्रीराधे! मुझे अखंड वृंदावन धाम का वास प्रदान करें, जहाँ मैं प्रतिदिन यमुना तट पर स्नान कर सकूँ। [1]

जहाँ गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा करूँ और ब्रजभूमि के पावन दर्शन से अपने जीवन को सफल बना सकूँ। [2]

जहाँ सेवाकुंज की आरती में सम्मिलित होऊँ और अंततः ब्रज की परम-पावन रज में ही विलीन हो जाऊँ। [3]

हे श्रीराधे! मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मैं वृंदावन छोड़कर कभी बाहर न जाऊँ। [4]