मेरे पलकन सो मग झारूँ - श्री हरिराय जी

मेरे पलकन सो मग झारूँ - श्री हरिराय जी

मेरे पलकन सो मग झारूँ ।
जामग में प्यारो मेरो आवत है तनमन जोवन वारूँ।।[1]
सेज सवारूँ चमर दुराऊँ मधुर मधुर स्वर गाऊँ।
रसिक प्रीतम पिय जो मिले मोहे हंस हंस कंठ लगाऊँ ।।[2]

- श्री हरिराय जी

मैं अपनी पलकों से पथ को बुहारूँगा क्योंकि वह [मेरे प्रियतम] इस मार्ग से ही मेरे पास आएँगे, मैं अपने तन मन एवं यौवन को उन पर वार दूंगा। [1]

मैं सेज सजाऊँगा, उन्हें चँवर करूँगा एवं मधुर मधुर स्वर में गान करूँगा । श्री हरिराय जी कहते हैं, "अगर मैं अपने प्रीतम रसिक श्री कृष्ण से मिलूंगा, तो मैं निश्चित रूप से उन्हें प्रेम पूर्वक गले लगाऊंगा"। [2]