भीतर सों मैलो हियो - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (62)

भीतर सों मैलो हियो - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (62)

भीतर सों मैलो हियो, बाहर रूप अनेक।
नारायण तासों भलो, कौआ तन मन एक॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (62)

जिसका हृदय भीतर से विकारों और छल-कपट से मलिन है, परंतु बाहर से उसने अनेक सुंदर और धार्मिक रूप धारण कर रखे हैं, उससे तो वह कौआ कहीं श्रेष्ठ है जो भीतर और बाहर (तन और मन) से एक समान काला है। श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि पाखंडपूर्ण भेष से कहीं बेहतर वह सहज सरलता है जिसमें कोई दिखावा न हो।