आजु अति राजति नागरी नाहु -  श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (5)

आजु अति राजति नागरी नाहु - श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (5)

(राग देव गंधार)
आजु अति राजति नागरी नाहु ।
बन घन कुंज कुंज प्रति बोलत अंसन पर धर बाहु ।। [1]
फूली लता परसि रस हँसि भरे गावत अधिक उछाहु ।
मंद मंद गति अति छवि उपजत निरखि सखी बलि जाहु ।। [2]
आनंद मगन भये लटकत नट पट भूषन तन जाहु ।
सरसदास सुख रासि लाड़िली लालन संग किलकाहु ।। [3]

- श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (5)

श्यामाकुंज बिहारी की आज की छवि बड़ी ही मोहक है। दोनों परस्पर गलबहियां दिये वृन्दावन की कुन्ज कुन्ज में भ्रमण करते डोल रहे है। [1]

पुष्पित लताओं का स्पर्श कर आनंद में भर हंस उठते हैं और अत्यंत उमंग से प्रेम के गीत गाने लगते हैं। मंद-मंद गति से जब ठमक-ठमक कर इठलाते चलते हैं, तो बड़े अच्छे लगते हैं जिसे देख समस्त सखियाँ बलिहारी जाती हैं । [2]

आनन्द-मगन लालजी की कटि बन खाती जाती है। वस्त्राभूषण बार-बार सरक सरक जाते है। शरीर के साथ मन की अटपटी चाह भी लटपटाने लगी है। प्रेम-विवश लाल के संग सुखराशि लाडिली आनन्दा- तिरेक से किलकती जा रही हैं। [3]