सारस सर बिछुरंत कौ जो पल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (6)

सारस सर बिछुरंत कौ जो पल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (6)

सारस सर बिछुरंत कौ जो पल सहय सरीर।
अगिनि - अनंग जु तिय भखै तौ जानै पर - पीर॥
तौ जानै पर पीर धीर धरि सकहि बज्र तन।
मरत सारसहिं फूटि पुनि न परचौ जु लहत मन॥
( जै श्री ) हित हरिवंश विचारि प्रेम विरहा बिनु वा रस।
निकट कंत नित रहत मरम कह जानै सारस॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (6)

भूमिकाः - (सारस के आक्षेप को सुनकर चकई अपने मन में विचार करती है कि) सारस का शरीर यदि सरोवर के अन्तर को एक क्षण के लिए भी सहन कर ले और उसकी पत्नी लक्ष्मणा को यदि काम की अग्नि का कठिन अनुभव करना पड़े तभी ये पराई पीड़ा को जान सकता है। इस स्थिति में कोई बज्र के समान कठोर शरीर वाला ही धैर्य धारण कर सकता है। सारस तो बिछड़ते ही मर जाता है और विरह का अनुभव प्राप्त करने का अवसर ही उसको नहीं मिलता। श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि प्रेम-विरह के बिना शृङ्गार रस की स्थिति विचारणीय (संदेहास्पद) बन जाती है। अपने प्रिय के नित्य निकट रहने वाला सारस इस मर्म को क्या जानै।

[ इस प्रकार संयोग और वियोग, प्रेम के दोनों रूप अपूर्ण है। इन दिनों से विलक्षण नित्य विहार रस ['वृन्दावन-रस] ही संयोग और वियोग दोनों प्रेम-धर्मों को सूक्ष्म रूप से धारण किये रहने के कारण प्रेम का पूर्ण रूप है।

संयोग की परावधि तो यह है कि दोनों (प्रिया-प्रियतम) एक क्षण के लिए भी वियुक्त नहीं होते और वियोग की सीमा यह है कि नित्य संयुक्त रहने पर भी अपने को अनमिले मानते हैं और अकुलाते हैं। जहां संयोग ही विरह रूप हो उसका वर्णन असंभव है।]
श्री भगवत रसिक जी महाराज ने लिखा है:
“मिले रहत मानो कबहूँ मिलेंना,
भगवत रसिक रसिक की बातें रसिक बिना कोउ समझ सकें न”


नित्य विहार रस में प्रिया प्रियतम नित्य मिले हुए रहते हैं फिर भी उन्हें लगता है कि उनका कभी मिलन नहीं हुआ, एवं उनके मिलन की ललक नित्य बढ़ती रहती है ।श्री भागवत रसिक कहते हैं कि रसिक की बातें केवल रसिक ही समझ सकते हैं अन्य नहीं ।
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