(राग कान्हरौं)
हँसत खेलत बोलत मिलत देखौ मेरी आँखिन सुख।
बीरी परस्पर लेत खवावत ज्यौं घन दामिनि
चमचमाप सोभा बहु भाँतिन सुख॥ [1]
स्तुति घुरि राग केदारौ जम्यौ
अधराति निसा रोम रोम सुख।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
के गावत सुर देत मोर भयौ परम सुख ॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (32)
श्री हरिदासी सखी अन्य रसिक सखियों से कहती हैं: दिव्य दंपति प्रीतम प्यारी रस भरे सागर में हँस हँस - मिल कर खेल - खेल रहे हैं, बातें कर रहे हैं और रस में भरे हुए हैं। प्रेम रस की वर्षा हो रही है, यह दुर्लभ अपार सुख मेरी आँखों में झलक रहा है।
वे एक दूसरे को पान खिला रहे हैं, [उनकी] सुंदरता घन दामिनी की तरह चमक रही है, और बहुत भाँति रस का वर्षण कर रहे हैं । [1]
दोनों की रतिक्रीडा के स्नेह में मानो राग केदार का प्राकट्य हुआ एवं रोम रोम में सुख का वर्षण हुआ । यहाँ प्रेम रस के तीन भावों में अधराति निसा यानि मध्य समय है, रोम रोम केलि सुख में रम रहा है । श्री हरिदासी सखी के स्वामी श्री श्यामा श्याम प्रेम गान कर रहे हैं, जिसे सुनकर मोर भी एकत्रित हो गए, एवं परम रस का प्राकट्य हुआ । [2]
हँसत खेलत बोलत मिलत देखौ मेरी आँखिन सुख।
बीरी परस्पर लेत खवावत ज्यौं घन दामिनि
चमचमाप सोभा बहु भाँतिन सुख॥ [1]
स्तुति घुरि राग केदारौ जम्यौ
अधराति निसा रोम रोम सुख।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
के गावत सुर देत मोर भयौ परम सुख ॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (32)
श्री हरिदासी सखी अन्य रसिक सखियों से कहती हैं: दिव्य दंपति प्रीतम प्यारी रस भरे सागर में हँस हँस - मिल कर खेल - खेल रहे हैं, बातें कर रहे हैं और रस में भरे हुए हैं। प्रेम रस की वर्षा हो रही है, यह दुर्लभ अपार सुख मेरी आँखों में झलक रहा है।
वे एक दूसरे को पान खिला रहे हैं, [उनकी] सुंदरता घन दामिनी की तरह चमक रही है, और बहुत भाँति रस का वर्षण कर रहे हैं । [1]
दोनों की रतिक्रीडा के स्नेह में मानो राग केदार का प्राकट्य हुआ एवं रोम रोम में सुख का वर्षण हुआ । यहाँ प्रेम रस के तीन भावों में अधराति निसा यानि मध्य समय है, रोम रोम केलि सुख में रम रहा है । श्री हरिदासी सखी के स्वामी श्री श्यामा श्याम प्रेम गान कर रहे हैं, जिसे सुनकर मोर भी एकत्रित हो गए, एवं परम रस का प्राकट्य हुआ । [2]

