पाइ रतन चीन्हौं नहीं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (82)

पाइ रतन चीन्हौं नहीं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (82)

पाइ रतन चीन्हौं नहीं, दीन्हों कर तें डार।
यह माया श्री कृष्ण की, मौह्यौ सब संसार॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (82)

यह मानव-देह एक अनमोल रत्न के समान है, जिसे प्राप्त करके भी तू अज्ञानवश व्यर्थ गँवा रहा है। यह तो वैसा ही है जैसे कोई अपने हाथों से ही अपनी बहुमूल्य संपत्ति को फेंक दे। वास्तव में, श्री कृष्ण की इस दुस्तर माया ने ही संपूर्ण जगत को अपनी मोहिनी शक्ति से भ्रमित कर रखा है।