(राग सोरठ)
रसिकवर मोहि सनाथ कियो ।
रसिकवर मोहि सनाथ कियो ।
महाप्रसाद दरस-चरनामृत, माथे हाथ दियो ॥ [1]
नेह-भरे दम्पति दरसाये, सीतल करयौ हियो ।
विपुन सु-वास रूप कौं दीनों, इनसों कौन बियो ॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (39)
रसिक-शिरोमणि श्रीस्वामी हरिदासजी महाराज ने हमें तो सब प्रकार से सनाथ कर दिया है। उन्होंने हमें दर्शन और चरणामृत का महाप्रसाद देकर जैसे ही हमारे मस्तक पर अपना हस्तकमल रखा कि हमें प्रणयी-युगल श्रीश्यामा-श्याम की मधुर लीलाएँ सहज हो दृष्टिगोचर होने लगीं। जन्म-जन्मान्तर से सन्तप्त हमारा हृदय शीतल हो गया। श्रीरूपसखीजी कहती हैं कि नित्यधाम श्रीवृन्दावन का सुन्दर वास देकर उन्होंने हमें कृतार्थ कर दिया है। कहो तो, उनके जैसा अनन्य-रसिक-सम्राट् और उदार-शिरोमणि इस संसार में दूसरा कौन है ?

