अपनी ओर टुक हेरो री, किशोरी राधे। [1]
हौं तो कुटिल नीच सब दिन को, विश्व विदित अघ मेरो री किशोरी राधे । [2]
पै 'बिनु हेतु पतितपावनि' यह, विरद दुर्यो कित तेरो री किशोरी राधे । [3]
शिशु नवजात न जानत मातहिँ, रहत मातु रुचि चेरो री किशोरी राधे । [4]
त्यों हौं अति अबोध जड़ पामर, महामोह तम घेरो री किशोरी राधे । [5]
हमरिहिं बेर बेर कतै एतिक, याको करिय निबेरो री किशोरी राधे । [6]
जगहुँ सुनात 'कृपालु' कुमात न, यदपि कुपूत घनेरो री किशोरी राधे। [7]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (2)
हे किशोरी राधे ! हमारी ओर न देखकर केवल अपनी ओर देखिए। [1]
मैं तो अनादि-कालसे ही आपको भूलकर अत्यन्त ही कुटिल एवं नीच बन चुका हूँ, तथा मेरे पापों को भी सारा संसार जानता है। [2]
किन्तु 'बिना कारण ही महान्-से- महान् पतितों को पवित्र करनेवाली' तुम्हारी इस प्रतिज्ञा का क्या होगा? मुझे इसका विचार है। [3]
जिस प्रकार नवजात बालक अपनी माता को पहिचान नहीं सकता, माता ही स्वभावत: उसकी इच्छाओं को पूर्ण करती है। [4]
उसी प्रकार मैं भी तो अत्यन्त अनजान, हठी एवं दुष्ट तुम्हारा ही बालक तो हूँ, जो अत्यन्त भयावह अज्ञान के अँधेरे में पड़ा हूँ। [5]
आपने किसी भी पतित के लिए इतनी देर नहीं की, फिर हमारे लिए इतनी देर क्यों कर रही हो, इसका विचार कीजिए। [6]
श्री कृपालु जी कहते हैं कि संसार में कुपुत्र कितने ही हो जाएँ, किन्तु कुमाता एक भी नहीं सुनाई पड़ती, बस इससे अधिक मुझे कुछ नहीं कहना है। [7]

