(सवैया)
मेरो सुभाव चितैबे को माई री, लाल निहार के बंसी बजाई। [1]
मेरो सुभाव चितैबे को माई री, लाल निहार के बंसी बजाई। [1]
वा दिन तें मोहि लागी ठगौरी सी, लोग कहें कोई बावरी आई॥ [2]
यों रसखानि घिरयौ सिगरो ब्रज, जानत वे कि मेरो जियराई। [3]
जो कोऊ चाहो भलो अपनौ तौ, सनेह न काहूसों कीजौ री माई॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
हे सखी! मेरे स्वभाव को देखकर ही गोपाल ने अपनी बाँसुरी बजाई। [1]
उस दिन से मैं मानो ठगी-सी रह गई हूँ। अब तो मुझे देखकर लोग कहते हैं, “यह कोई बावरी है जो यहाँ आ गई है।” [2]
पूरा ब्रजमंडल मुझे घेरे रहता है, पर मेरे हृदय की सच्ची बात तो केवल श्री कृष्ण जानते हैं और मेरा अपना हृदय। [3]
जो कोई अपना भला चाहता हो, तो हे सखी! उसे किसी से प्रेम नहीं करना चाहिए। [4]

