परस्परं प्रेमरसे - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (196)

परस्परं प्रेमरसे - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (196)

परस्परं प्रेमरसे निमग्नमशेषसंमोहनरूपकेलि।
वृन्दावनान्तर्नवकुंजगेहे तन्नीलपीतं मिथुनं चकास्ति ।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (196)

परस्पर प्रेम-रस में निमग्न एवं सौन्दर्य पूर्ण क्रीड़ाओं से सबको मोहित करने वाला वह गौर-श्याम युगल श्रीवृन्दावन के मध्य में स्थित नवीन कुंज गृह में प्रकाशित हो रहा है।