व्यास रसिक तासौं कहैं, काटै माया फंद।
हरिजन सौं हिलमिल रहै, कबहुँ न व्यापत द्वन्द॥
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, साखी (38)
श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि वे उसी को रसिक मानते हैं जो जीव के माया-फंदे को काटने में समर्थ हो, समस्त भक्तों के प्रति समान आदर का भाव रखे और किसी के प्रति एक क्षण के लिए भी दुर्भावना न रखे।

