जब तें प्रभुहिं नवायो माथ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (129)

जब तें प्रभुहिं नवायो माथ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (129)

जब तें प्रभुहिं नवायो माथ।
तव तें सुखही में सुख दीनों लीनों गहि हरि हाथ।। [1]
आज्ञाहीन दीन भयौ पै तज्यौ न स्वामी साथ।
श्रीबिहारिदास चेरे सों राख्यौ सहज सनेही नाथ।। [2]

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (129)

जो भी व्यक्ति सच्चे हृदय से एक बार श्रीबिहारीजी महाराज की शरण में आ जाता है, उसकी भविष्य की सारी जिम्मेदारी ये अपने ऊपर ले लेते हैं और उसका हाथ पकड़ कर, सुख ही सुख [रस] बरसाते हैं। [1] 

कदाचित् वह आज्ञाहीन होकर भटकना भी चाहे तो दिनानुदिन बढ़ता इनका अपनत्व उसे ऐसा करने नहीं देता एवं श्री बिहारीजी कभी भी उसका साथ नहीं छोड़ते एवं अपना बनाके रखते हैं सदा सदा के लिए । [2]