(राग गौरी व सारंग)
व्रजवासी जाने रस रीति।
जिनके हृदय और नहीं भावत नंदसुवन पद प्रीति ।। [1]
सर्व भाव सर्वात्म निवेदन रहत हैं त्रिगुणातीत।
करत महल में टहल निरंतर जात याम युग बीत ।। [2]
जिनकी गति और नहीं जाने बिच जवनिका भीति।
कोई एक लहै दास परमानंद गुरु प्रसाद प्रतीति ।। [3]
- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1368)
रस रीति को केवल ब्रजवासी ही जानते हैं, जिनके हृदय में श्री श्याम सुंदर के चरणों के प्रति अनन्य प्रेम है । [1]
उनका प्रत्येक भाव केवल श्री राधा कृष्ण को समर्पित है, उन्होंने अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया है, वे त्रिगुणातीत [ राजस, तामस एवं सात्विक गुणों से परे] हैं । नित्य ही वह महल की टहल करते हैं एवं सेवा से पृथक उनका एक एक पल लाखों वर्षों के समान व्यतीत होता है । [2]
ब्रजवासियों की गति कोई नहीं जान सकता (सांसारिक जीवों से पृथक हैं) मानो कि उनके बीच एक दीवार खड़ी हो [उनकी गति समझना असंभव है]। श्री परमानंद दास कहते हैं, "ऐसे गुणों एवं गति को केवल गुरु की कृपा से प्राप्त किया जा सकता है। [3]
व्रजवासी जाने रस रीति।
जिनके हृदय और नहीं भावत नंदसुवन पद प्रीति ।। [1]
सर्व भाव सर्वात्म निवेदन रहत हैं त्रिगुणातीत।
करत महल में टहल निरंतर जात याम युग बीत ।। [2]
जिनकी गति और नहीं जाने बिच जवनिका भीति।
कोई एक लहै दास परमानंद गुरु प्रसाद प्रतीति ।। [3]
- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1368)
रस रीति को केवल ब्रजवासी ही जानते हैं, जिनके हृदय में श्री श्याम सुंदर के चरणों के प्रति अनन्य प्रेम है । [1]
उनका प्रत्येक भाव केवल श्री राधा कृष्ण को समर्पित है, उन्होंने अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया है, वे त्रिगुणातीत [ राजस, तामस एवं सात्विक गुणों से परे] हैं । नित्य ही वह महल की टहल करते हैं एवं सेवा से पृथक उनका एक एक पल लाखों वर्षों के समान व्यतीत होता है । [2]
ब्रजवासियों की गति कोई नहीं जान सकता (सांसारिक जीवों से पृथक हैं) मानो कि उनके बीच एक दीवार खड़ी हो [उनकी गति समझना असंभव है]। श्री परमानंद दास कहते हैं, "ऐसे गुणों एवं गति को केवल गुरु की कृपा से प्राप्त किया जा सकता है। [3]

