अति सूछम कोमल अतिहि - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (16)

अति सूछम कोमल अतिहि - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (16)

अति सूछम कोमल अतिहि, अति पतरो अति दूर।
प्रेमकठिन सबते सदां, नित इकरस भरपूर॥

- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (16)

दिव्य प्रेम अत्यन्त सूक्ष्म और अत्यन्त कोमल है। यह बहुत पतला (सूक्ष्म) है और बहुत दूर भी है। यह सबसे कठिन भी है। इसे पूर्ण रूप से केवल भाव के द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है और यह नित्य है।