(राग मलार)
काम रस भींजे हैं दोउ लाल ।
पानिप रूप बढ़ी कछु औरे, घूमत नैंन विसाल ।। [1]
छूटी अलक टूटी हारावलि, श्रम जलकन बने भाल ।
सूरत-समर-सर ते नहिं निकसत, 'हित ध्रुव' उभय मराल ।। [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (69)
आज पावस के रसमय पर्व पर श्री लाडिली-लाल युगल प्रेम-रूपी काम-रस से भींज रहे हैं । उनकी रूप लावण्य छवि कुछ विलक्षण ही प्रकार से वृद्धि को प्राप्त है । उनके विशाल युगल नैन प्रेम-मद से घूर्णित हैं ।[1]
केश-राशि विगलित है, वक्षस्थल की हारावलि खंडित है और उनके ललाट पर श्रमजन्य प्रस्वेद-कण झलक रहे हैं । श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि फिर भी सूरत-संग्राम रूपी सरोवर में क्रीड़ा करने वाले ये युगल राजहंस, उस सरोवर से निकलना ही नहीं चाहते, अहनिर्श वहीं रमते रहना चाहते हैं ।[2]
काम रस भींजे हैं दोउ लाल ।
पानिप रूप बढ़ी कछु औरे, घूमत नैंन विसाल ।। [1]
छूटी अलक टूटी हारावलि, श्रम जलकन बने भाल ।
सूरत-समर-सर ते नहिं निकसत, 'हित ध्रुव' उभय मराल ।। [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (69)
आज पावस के रसमय पर्व पर श्री लाडिली-लाल युगल प्रेम-रूपी काम-रस से भींज रहे हैं । उनकी रूप लावण्य छवि कुछ विलक्षण ही प्रकार से वृद्धि को प्राप्त है । उनके विशाल युगल नैन प्रेम-मद से घूर्णित हैं ।[1]
केश-राशि विगलित है, वक्षस्थल की हारावलि खंडित है और उनके ललाट पर श्रमजन्य प्रस्वेद-कण झलक रहे हैं । श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि फिर भी सूरत-संग्राम रूपी सरोवर में क्रीड़ा करने वाले ये युगल राजहंस, उस सरोवर से निकलना ही नहीं चाहते, अहनिर्श वहीं रमते रहना चाहते हैं ।[2]

