सापराधाश्चे ये राधापदमाधाय चेतसि - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.28)

सापराधाश्चे ये राधापदमाधाय चेतसि - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.28)

सापराधाश्चे ये राधापदमाधाय चेतसि।
वसन्ति-वृन्दाविपनेऽनन्यान् धन्यान् नमामि तान्।

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.28)

जो अपराधी होकर भी चित्त में श्रीराधापदपद्मों को धारण करते हुए श्रीवृन्दावन में अनन्य वास करते हैं, उन बड़भागी भक्तगणों को मैं नमस्कार (उनका ध्यान) करता हूँ।