(दोहा)
आन कहैं आने न उर, हरि-गुरु सों रति होइ।
सुखनिधि स्यामा-स्याम के, पद पावै भल सोइ ॥
पद -(इकताल)
स्यामा-स्याम पद पावै सोई ।
मन-बच-क्रम करि सदा निरंतर, हरि-गुरु-पद-पंकज रति होई ॥ [1]
नंदसुवन वृषभानुसुता पद, भजै तजै मन आनै जोई।
श्रीभट अटकि रहै स्वामी पन, आन कहैं मानै सब छोई ॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य - युगल शतक (6)
(दोहा)
जो श्रीहरि एवं श्रीगुरु को समान मानकर अनन्य भाव से गुरु-आज्ञा में चलकर अपना जीवन व्यतीत करता है, वह ही सुखनिधि-स्वरूप श्रीश्यामाश्याम के चरणों तक पहुँच सकता है।
(पद)
श्रीश्यामाश्याम के चरणारविन्दों की प्राप्ति के रहस्य का उद्घाटन करते हुए श्रीभट्टजी कहते हैं सुख निधान श्रीश्यामाश्याम के पद-कमल केवल वही प्राप्त कर सकता है जिसकी श्रीहरि-गुरु के चरण-कमलों में मन, वचन एवं कर्म से नित्य एवं अनन्य निरन्तर रति (भक्ति ) हो; अन्यों के लिए तो वे दुर्लभ ही हैं। [1]
अतः मन में और किसी की बात को स्थान न देकर, अपने आराध्य की चर्चा के अतिरिक्त अन्य समस्त वार्ता को निःसार जानकर त्याग देना और सदा-सर्वदा श्रीवृषभानुनन्दनी एवं नन्दनन्दन के पादारविन्दों का भजन करते हुए अपने स्वामी के प्रण ( प्रतिज्ञा) पर दृढ़ रहना चाहिए। [2]

