जहाँ जहाँ ठाढ़ौ लख्यौ, स्यामु सुभग सिरमौरु।
बिनहूँ उनु छिन गहि रहतु, दृगनु अजौं वह ठौरु॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (7)
जहाँ-जहाँ मैंने उन परम सुंदर रसिक शिरोमणि श्री श्यामसुन्दर को खड़े हुए देखा था, उनके वहाँ न रहने पर भी आज वे स्थान आँखों को एक क्षण के लिए बरबस पकड़ लेते हैं—आँख वहाँ से हटती ही नहीं।
बिनहूँ उनु छिन गहि रहतु, दृगनु अजौं वह ठौरु॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (7)
जहाँ-जहाँ मैंने उन परम सुंदर रसिक शिरोमणि श्री श्यामसुन्दर को खड़े हुए देखा था, उनके वहाँ न रहने पर भी आज वे स्थान आँखों को एक क्षण के लिए बरबस पकड़ लेते हैं—आँख वहाँ से हटती ही नहीं।

