बृंदावन नीको लागै है -  श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (721)

बृंदावन नीको लागै है - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (721)

(राग कालिंगडा, इकताला)
बृंदावन नीको लागै है ।
सजल सघन स्यामसुंदर-प्रेम-बागै है ।
जमुना कें तट मोहन महा हियाराँ खागै है ।
आनँदघन मुरलिका-धुनि कोकिला रागै है ।।
-  श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (721)

श्री आनंदघन कह रहे है "श्री धाम वृन्दावन, जो सजल है, सघन है, श्री श्यामसुंदर के प्रेम का बाग है, मुझे अति प्रिय है। श्री यमुना के किनारे श्री श्यामसुंदर का विचरण देख ह्रदय बिंध जाता है।" श्री आनंदघन कह रहे है "श्री श्यामसुंदर की मुरली की मधुर धुन सुनकर कोकिला अलाप ले रही है।"