(राग कान्हरौ)
गुन की बात राधे तेरे आगैं को जानैं
जो जानैं सो कछु उनहारि। [1]
नृत्य गीत ताल भेदनि के बिभेद जानैं
कहूँ जिते किते देखे झारि॥ [2]
तत्त्व सुद्ध स्वरूप रेख परमान
जे बिज्ञ सुधर ते पचे भारि। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी नैंक
तुम्हारी प्रकृति के अंग अंग और गुनी परे हारि॥ [4]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (23)
श्री ललिता सखी [श्री हरिदासी सखी] निकुंज विहारिणी श्री राधा जू के गुणों का वर्णन कर रही हैं : "हे राधे, ऐसा कौन है जो आपके गुणों का वर्णन करने में समर्थ हो?" वह जो कुछ यदि थोड़ा जानता है वह आपका ही प्रतिबिंब होगा । [1]
कोई भी नृत्य, गीत और तालों के रहस्यों को पूर्ण रूप से आपके अतिरिक्त नहीं जानता है, चाहे वह कितना ही उसमें विशेषज्ञ एवं निपुण क्यूँ न हो । [2]
इन कलाओं का तत्व, शुद्ध स्वरूप, दायरा एवं सीमा [कोई नहीं जानता], जो इनमें निपुण हैं, उन्होंने श्रमपूर्वक इन्हें जानने की कोशिश की, परंतु उनका यह परिश्रम व्यर्थ है । [3]
श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी हैं; जिनके [श्री राधा] अंग अंग के प्रभाव [भावों] से समस्त गुणी जनों को पराजित किया जा सकता है। [4]
गुन की बात राधे तेरे आगैं को जानैं
जो जानैं सो कछु उनहारि। [1]
नृत्य गीत ताल भेदनि के बिभेद जानैं
कहूँ जिते किते देखे झारि॥ [2]
तत्त्व सुद्ध स्वरूप रेख परमान
जे बिज्ञ सुधर ते पचे भारि। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी नैंक
तुम्हारी प्रकृति के अंग अंग और गुनी परे हारि॥ [4]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (23)
श्री ललिता सखी [श्री हरिदासी सखी] निकुंज विहारिणी श्री राधा जू के गुणों का वर्णन कर रही हैं : "हे राधे, ऐसा कौन है जो आपके गुणों का वर्णन करने में समर्थ हो?" वह जो कुछ यदि थोड़ा जानता है वह आपका ही प्रतिबिंब होगा । [1]
कोई भी नृत्य, गीत और तालों के रहस्यों को पूर्ण रूप से आपके अतिरिक्त नहीं जानता है, चाहे वह कितना ही उसमें विशेषज्ञ एवं निपुण क्यूँ न हो । [2]
इन कलाओं का तत्व, शुद्ध स्वरूप, दायरा एवं सीमा [कोई नहीं जानता], जो इनमें निपुण हैं, उन्होंने श्रमपूर्वक इन्हें जानने की कोशिश की, परंतु उनका यह परिश्रम व्यर्थ है । [3]
श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी हैं; जिनके [श्री राधा] अंग अंग के प्रभाव [भावों] से समस्त गुणी जनों को पराजित किया जा सकता है। [4]

