प्रगट जगत में जगमगै, वृन्दाविपिन अनूप।
नैन अछत दीसत नहीं, यह माया कौ रूप॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (83)
संसार में प्रकट रूप से अनुपम वृन्दावन झिलमिला रहा है और सुशोभित हो रहा है; फिर भी जीव उस रस-स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाता—यह भी माया का ही रूप है।
नैन अछत दीसत नहीं, यह माया कौ रूप॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (83)
संसार में प्रकट रूप से अनुपम वृन्दावन झिलमिला रहा है और सुशोभित हो रहा है; फिर भी जीव उस रस-स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाता—यह भी माया का ही रूप है।

