मोरपखा मुरली बनमाल - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

मोरपखा मुरली बनमाल - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

(सवैया)
मोरपखा मुरली बनमाल, लख्यौ हिय मैं हियरा उमह्यौ री।
ता दिन ते इन बैरिन कों, कौन न बोल कुबोल सह्यौ री॥ [1]
तौ रसखानि सनेह लग्यौ, कोउ एक कहौ कोउ लाख कह्यौ री।
और तो रँग रहौ न रहौ, इक रंग रंगी सोई रँग रह्यौ री॥ [2]

- श्री रसखान, रसखान रत्नावली

जब से मैंने मोरपंख, मुरली और वनमाला से सुसज्जित श्यामसुंदर को देखा, तभी से हृदय में प्रेम की लहरें उमड़ने लगीं। उस दिन से न जाने कितने ताने और कटु वचन सहने पड़े। [1]

अब तो हे रसखान! प्रेम का रंग ऐसा चढ़ गया है कि कोई कुछ कहे या लाख कहे, सब व्यर्थ है। संसार के सब रंग फीके पड़ सकते हैं, पर साँवरे का यह प्रेम रंग अब कभी नहीं उतरेगा। [2]