हरि हरि धिगस्तु मामिह यदतिसुतुच्छेषु लोकधर्मेषु।
अस्वार्थेष्वतिसक्तो विहन्मि वृन्दावनेऽप्यहो वासम्।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.87)
हरि! हरि!! मुझे धिक्कार है!!! क्योंकि अति तुच्छ एवं अपना स्वार्थ(अभीष्ट) विनाश करने वाले लोक-धर्मों में अति-आसक्त होकर मैं श्रीवृन्दावन वास को भी नष्ट कर रहा हूँ।

