जुग मुख छवि बरनी - श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (16)

जुग मुख छवि बरनी - श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (16)

(राग सारंग)
जुग मुख छवि बरनी न परैं री ।
उपजत मैंन परस्पर बैंननि नैंननि में मुसकात हरैं री ॥ [1]
अंस भुजा दीनैं भीने रँग रहसि बहसि हँसि अंक भरैं री । 
विवस भये विहरत पिय प्यारी सरसदास उर संचि धरैं री॥ [2]
- श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (16)

श्रीप्रियालाल के मुखारविन्दों की रूप-माधुरी कहते नहीं बनती । परस्पर प्रेम भरी बातों से इनके दिव्य श्रीअगों में प्रेम रूपी अनंग का संचार हो रहा है। नयनों ही नयनों में जब ये मुस्कुराते हैं, तब तो सुध-बुध भूलकर ये एक-दूसरे के हाथों बिक जाते हैं । [1]

परस्पर गलबहियाँ दिये आनन्द के रंग में सराबोर ये दोनों एकान्त में हँस-हँसकर एक-दूसरे के कण्ठहार बने हैं। प्रेम-विवश ये लाड़िलीलाल नित नये-नये कौतुक करते रहते हैं जिन्हें रसिकजन सहेज-कर अपने हृदय में संचित करते रहते हैं। [2]