ऐसे किशोरी जू नाहीं बनो - ब्रज के सवैया

ऐसे किशोरी जू नाहीं बनो - ब्रज के सवैया

ऐसे किशोरी जू नाहीं बनो, कैसे सुधि मोरि बिसार रही हो। [1]
हे दीनन स्वामिनि रस विस्तारिणी, का मम बार बिचार रही हो॥ [2]
तोर बिलोकत ऐसी दशा, मोहे क्यों भवसिंधु मे डार रही हो। [3]
मो सम दीन अनेकन तारे, वा श्रम सों अब हार रही हो॥ [4]

- ब्रज के सवैया

हे किशोरी जी! आप जैसी दयालु और करुणामयी कोई नहीं है, फिर आप मेरी सुध क्यों भूल रही हैं? [1]

हे दीनों की एकमात्र स्वामिनी, हे रस-संपदा की विस्तारिणी! ऐसा क्या कारण है कि जब मुझ पर अनुकंपा की वेला आई, तब आप बार-बार विचार कर रही हैं? [2]

हे राधे, आपके होते हुए भी मेरी दशा दयनीय क्यों है? मुझे इस भव-सागर से पार लगाकर अपने चरण-कमलों की शरण में क्यों नहीं ले जातीं? [3]

अरे कृपामयी, श्री राधे! आपने तो असंख्य दीन जनों का उद्धार किया है, फिर मेरी बारी आने पर क्यों संकोच कर रही हैं? [4]