वृषभानु नंदिनी राजति हैं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (15)

वृषभानु नंदिनी राजति हैं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (15)

वृषभानु नंदिनी राजति हैं।
सुरत-रंग-रस भरी भामिनी, सकल नारि सिर गाजति हैं॥ [1]
इत-उत चलति, परत दोऊ पग, मद-गयंद गति लाजति हैं।
अधर निरंग, रंग गंडनि पर, कटक काम कौ साजति हैं॥ [2]
उर पर लटक रही लट कारी, कटिव किंकिनी बाजति हैं।
(जैश्री) हित हरिवंश पलटि प्रीतम पट, जुवति जुगति सब छाजति हैं॥ [3]

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (15)

श्रीवृषभानुनन्दिनी सुशोभित हो रही हैं।  सुरत के रंग-रस से भरी हुई ये भामिनी सम्पूर्ण स्त्रियों को अपनी शोभा से पराजित करके उल्लसित हो रही हैं। [1]

इधर-उधर चलने में ये अपने पद विन्यास के द्वारा मत्त गयन्द की गति को लज्जित करती हैं। इनके अधर रंग शून्य हैं और कपोल पीक के रंग से रंजित हैं जिनकी अनूठी छबि के द्वारा वे अपने प्रियतम के चित्त में कामदेव के समूह को सजा रही हैं। (उनके मन में काम के मनोरथों को उत्पन्न कर रही हैं।) [2]

उनके वक्षस्थल पर काली लटें लटक रही हैं, एवं कटि में किंकिणी बज रही है। सखी भावापन्न श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि उन्होंने इस समय अपने नीलपट के बदले में प्रियतम का पीतपट ओढ़ रखा है। किन्तु इन युवती को सब युक्तियाँ शोभा देती हैं। (इनकी हर प्रकार से शोभा बढ़ती है।) [3]