मन सुढाल में ढरौ अरु, जिय जु परौ जस जाल - श्री भट्ट देवाचार्य - युगल शतक (8)

मन सुढाल में ढरौ अरु, जिय जु परौ जस जाल - श्री भट्ट देवाचार्य - युगल शतक (8)

(दोहा)
मन सुढाल में ढरौ अरु, जिय जु परौ जस जाल ।
आलस उपजौ आन सों, लालस पद जुग लाल ॥


(पद) - (इकताल)
निसि दिन लगि रहौ यह लालस ।
स्यामा-स्याम चरन की सेवा, बिना आन सों उपजौ आलस ॥ [1]
कहत सुनाय सु मन बच क्रम करि, उरझि रहौ जिय जुग-जस जालस ।
जै श्रीभट्ट अघट घटना में, ढरौ सदा मन मोर सुढालस ॥ [2]

- श्री भट्ट देवाचार्य - युगल शतक (8)

(दोहा)
श्रीश्यामाश्यामजू के लीला-रसाल में ही मेरा मन उन्मत्त लगा रहे, मानो मेरा हृदय युगल-रस के एक जाल ही में उलझ जाए। अन्य सभी वस्तुओं के प्रति मेरे हृदय में आलस उत्पन्न हो जाए, हृदय की लालसा केवल और केवल श्रीयुगल-चरण में ही लगी रहे।

(पद)
श्रीभट्टजी युगलकिशोर श्री श्यामाश्याम के चरणारविन्दों की सेवा में अपने मन की लालसा प्रकट करते हुए कहते हैं
श्रीश्यामाश्याम के चरणारविन्दों की सेवा-परिचर्या में मेरे मन की लालसा (उत्कट अभिलाषा, चाह) निरन्तर बनी रहे तथा इसके अतिरिक्त समस्त वस्तुओं में आलस्य उत्पन्न हो जाय । (क्योंकि सार पदार्थ तो सेवा-भाव ही है, अन्यान्य सांसारिक पदार्थ जो देखने, सुनने में आते हैं उनके प्रति आलस्य-भाव उत्पन्न हो जाना ही श्रेयष्कर है)। [1]

श्री भट्ट जी अपने हृदय के अंतरंग भाव को मन, वचन और क्रिया से सत्य प्रतीति पूर्वक सुनाते हुए कहते हैं कि (इस जीव का कल्याण तभी संभव है) जब यह भली भांति श्रीयुगलकिशोर के लीला-यश-जाल में अपने चित्त को उलझा दे। अर्थात् निरन्तर श्रीप्रिया प्रियतम के यश गुणानुवाद का चिन्तन करते रहना ही जीव का परम कर्तव्य है। श्री भट्ट जी अपने उपास्य से विनती करते हुए कहते हैं - हे श्रीयुगलकिशोर ! आपकी जय हो आपकी अघट-घटनाओं (अलौकिक लीलाओं) के चिन्तन में मेरे मन की भावना सुन्दर रीति से ढरी रहे अर्थात् बनी रहे। [2]