प्रीतम नन्द किशोर, जा दिन ते नैननि लग्यौ।
मन भावन चित चोर, पलक औट नहि सहि सकौं॥
- श्री रसखान
हे मेरे प्रियतम नन्दनन्दन! जिस दिन से मेरी आँखें आपसे लगी हैं, आप मेरे मन को भाने वाले और चित्त को चुराने वाले बन गए हैं। अब स्थिति यह है कि आपके दर्शनों के बीच में मैं पलकों की ओट (झपकन) भी सहन नहीं कर पाती; वह क्षण भर का व्यवधान भी मुझे असह्य प्रतीत होता है।
मन भावन चित चोर, पलक औट नहि सहि सकौं॥
- श्री रसखान
हे मेरे प्रियतम नन्दनन्दन! जिस दिन से मेरी आँखें आपसे लगी हैं, आप मेरे मन को भाने वाले और चित्त को चुराने वाले बन गए हैं। अब स्थिति यह है कि आपके दर्शनों के बीच में मैं पलकों की ओट (झपकन) भी सहन नहीं कर पाती; वह क्षण भर का व्यवधान भी मुझे असह्य प्रतीत होता है।

