अमून्यधन्यानि दिनान्तराणि हरे - श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (41)

अमून्यधन्यानि दिनान्तराणि हरे - श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (41)

अमून्यधन्यानि दिनान्तराणि हरे त्वदालोकनमन्तरेण । 
अनाथबन्धो करुणैकसिन्धो हा हन्त हा हन्त कथं नयामि ।।
- श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (41)

हे अनाथवन्धु ! हे करुणासागर ! हे हरि श्रीकृष्ण ! तुम्हारे दर्शन के बिना इन अधन्य दिनों के मध्य भागों को कैसे बिताऊँ ?