जमुना अन्हात वृषभान की - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (45)

जमुना अन्हात वृषभान की - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (45)

जमुना अन्हात वृषभान की कुमारि राधा,
रूप की अगाधा तन छबि वृन्द बरसैं। [1]
रमा उमा दमा सी सची सी सतभामा हूँ सी,
मैनिका सी जाकी पद रेनुका कौं तरसैं॥ [2]
'लाल बलबीर' झुकि झुकि लता ओट लाल,
बेर बेर हेर हेर हेर मन हरसैं। [3]
चुबकि लगाय निसरत प्रान प्यारी मानौं,
सामल घटा में चन्द छिप छिप दरसैं॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (45)

जब रूप की अगाधा, श्री वृषभानु कुमारी, साक्षात नित्य बिहारीनी श्री राधा यमुना के तट पर स्नान करने के लिए सुशोभित होती हैं, तब वृंदावन में उनके दिव्य अंगों की सुंदरता की वर्षा होती है। [1]

महालक्ष्मी, पार्वती, साची [इंद्र की पत्नी], सत्यभामा, मेनका आदि दिव्य देवियाँ भी श्री राधा महारानी की चरण रेणु [रज] के लिए तरसती हैं। [2]

श्री लाल बलबीर कहते हैं कि श्री कृष्ण यमुना के किनारे झुक-झुक कर लताओं की ओट में छिपे बार-बार निहार रहे हैं और मन ही मन आनंदित हो रहे हैं। [3]

श्री कृष्ण अपनी प्राण-प्यारी को अपलक ऐसे निहार रहे हैं, मानो ऐसा लगता है जैसे चंद्रमा काले बादलों में छिप-छिप कर दर्शन कर रहा हो। [4]