(राग मल्हार)
आज वन उमगि रही वृजनारी।
फूली फिरत निशंक गुन गावत, झूलत प्रान पियारी॥ [1]
एक कुसुम लाई डारत ऊपर, एक चितनत रही ठाड़ो।
एक जो आय धाय मोहन पर, अन्क भरत है गाढी॥ [2]
नील पीत अंग-अंग विराजत, और श्रृंगार सिंगरे।
'सूर' संग विलसत है भामिनि, नेकहु होत न न्यारै ॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
आज वन में समस्त ब्रज नारी उमंग से भरी हैं। निश्चित ही हर्षोल्लास से सब सखियाँ गुणrगान कर रही हैं एवं प्राण प्यारी श्री स्वामिनी जी [श्री राधा] झूला झूल रही हैं। [1]
एक सखी फूल की सेवा कर रही है, फूलों को लाकर श्री राधा के ऊपर सजा रही है, एक सखी उन दोनों को अपलक निहार रही है। एक सखी श्री कृष्ण की तरफ भाग कर जा रही है और उन्हें गले से लगा रही है। [2]
श्री प्रिया प्रियतम के अंगों पर नीले और पीले वस्त्र हैं एवं विभिन्न प्रकार के श्रिंगार से सजे हैं। श्री सूरदास कहते हैं, "परम कृपालु स्वामिनी भामिनी [श्री राधा] सुर [कृष्ण] संग विलास कर रही हैं, एवं यह दोनों एक क्षण को भी अलग नहीं होते।" [3]

