व्रत, तप, निगम, नेम, यम, संजम, करहु कलेस कोटि किन भारी।
इनमें पहुँच नाहिं काहू की, परे रहत ज्यौं द्वार भिखारी ।। [1]
जोग यज्ञ फल मैंड़ करत हैं, तीरथ सब कर लीनें झारी।
धर्म मोक्ष कोउ पूँछत नाहीं, इन मग सिद्धैं कौन बिचारी ।। [2]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (33)
भक्ति रहित जो भी व्रत, तप, वेद-पाठ, नियम यम,संयम आदि बड़े-बड़े साधन हैं, कष्ट साध्य एवं क्लेशदायक हैं तथा इनका प्रवेश भक्ति-देवी के द्वार तक नहीं है । ये सभी याचकों की भाँति भक्ति-देवी की कृपा की आकांक्षा लिये उनके द्वार पर पड़े रहते हैं । [1]
इनसे इतर जो योग यज्ञ एवं तीर्थ-आदि साधन हैं, वे भी अनुचर हुए भक्ति-देवी के पाद-प्रक्षालनार्थ हाथों में जल की झारी लिये हुए सेवा में उपस्थित रहते हैं। अधिक क्या कहें! यहाँ तो सर्वश्रेष्ठ धर्म, मोक्ष पर्यन्त सुखों की भी उपेक्षा हो जाती है। तब क्षुद्र सिद्धियों के लिये तो स्थान ही कहाँ है ? [2]

