कदा गायं गायं मधुर - मधुरीत्या मधुभिद श्चरित्राणि स्फारामृत-रस विचित्राणि वहुश:।
मृजन्ती तत्केलभवनमभिरामं मलयज च्छटाभि: सिञ्चन्ति रसहृद निमग्नास्मि भविता ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (201)
मैं कब मधुसूदन के घनीभूत अमृत-रस-पूर्ण विचित्र एवं अनन्त चरित्रों का मधुर-मधुर रीति से गायन करती हुई और उनके अभिराम केलि-भवन का सम्मार्जन तथा मलयज मकरन्द से सिञ्चन करती हुई रस-समुद्र में निमग्न होऊँगी ?
मृजन्ती तत्केलभवनमभिरामं मलयज च्छटाभि: सिञ्चन्ति रसहृद निमग्नास्मि भविता ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (201)
मैं कब मधुसूदन के घनीभूत अमृत-रस-पूर्ण विचित्र एवं अनन्त चरित्रों का मधुर-मधुर रीति से गायन करती हुई और उनके अभिराम केलि-भवन का सम्मार्जन तथा मलयज मकरन्द से सिञ्चन करती हुई रस-समुद्र में निमग्न होऊँगी ?

