खेलत आजु प्रिया नव - श्री ललित मोहिनी देव जू, श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी (45)

खेलत आजु प्रिया नव - श्री ललित मोहिनी देव जू, श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी (45)

(राग बसंत)
खेलत आजु प्रिया नव रंगी।
चमकत रमकत लगी स्याम उर ललित मोहिनी संगी ।। [1] 
जोवन झलक ललक सुंदर की बाढ्यौ रंग अनंगी । 
यह सुख पीवत जीवत हम सब देखत केलि तरंगी ।। [2]
- श्री ललित मोहिनी देव जू, श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी (45)

आज श्री प्रिया जी [श्री राधा] अद्बुत ही रंग में नित्य विहार रस में उन्मत्त हैं । श्री ललित मोहिनी जी की नित्य संगी श्री प्रिया जी चमक रही हैं, झूमते हुए श्री श्याम सुंदर के उर से लगी हुई उन्मत्तता में भरकर विहार कर रही हैं । [1]

नव यौवन की इस झलक को निहार, नित्य ही ललक बढ़ रही है, एवं नव नव रंग का संचार हो रहा है । श्री ललित मोहिनी देव जी महाराज कहते हैं कि ऐसा सुख [रस] का पान करके ही वह जीवित हैं अर्थात् यह नित्य विहार रस ही उनका प्राण है । इस केली विहार को निहारने एवं नित्य विहार रस पान करने में समर्थ केवल श्री प्रिया जी की निज दासियाँ ही हैं, अन्य किसी का यहाँ प्रवेश नहीं है । [2]