न मैं घनश्याम तुमको दुःख से घबराकर के छोडूंगा - श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी

न मैं घनश्याम तुमको दुःख से घबराकर के छोडूंगा - श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी

न मैं घनश्याम तुमको दुःख से घबराकर के छोडूंगा ।
जो छोडूंगा तो मैं भी कुछ तमाशा कर के छोडूंगा ।।[1]
अगर था छोड़ना मुझको तो फिर क्यूं हाथ पकड़ा था।
जो अब छोड़ा तो मैं जाने न क्या-क्या करके छोडूंगा ।। [2]
मेरी रुसवाईयाँ देखो मजे से शौक से लेकिन ।
तुम्हें में भी सरे बाजार रुसवा करके छोडूंगा ।। [3]
तुम्हें है नाज यह बेदर्द रहता है हमारा दिल ।
मैं उस बेदर्द दिल में दर्द पैदा कर के छोडूंगा ।। [4]
निकाला तुमने अपने दिल के जिस घर से उसी घर पर ।
अगर दृग ‘बिन्दु’ जिंदा है तो कब्जा कर के छोडूंगा ।। [5]

- श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी

इस दोहे में एक भक्त भगवान कृष्ण से प्रेमपूर्वक झगड़ कर रहा है:
हे भगवान कृष्ण, मैं अपने कष्टों से भयभीत होकर तुम्हें नहीं छोड़ूँगा। अगर मुझे तुम्हें छोड़ना पड़ा तो मैं कुछ बड़ी उथल-पुथल करूंगा। [1]

अगर मुझे छोड़ना ही था तो तुमने मेरा हाथ क्यों थामा था? अब यदि आपने मुझे छोड़ा तो न जाने मैं क्या क्या करूँगा। [2]

मेरी बदनामी को अवश्य देखो, एवं बड़े आनंद पूर्वक देखो, लेकिन मैं भी सरे बाजार [पूरे संसार] के समक्ष तुम्हें बदनाम करके ही छोडूंगा। [3]

तुमको अभिमान है कि मुझे ह्रदय में वियोग की पीड़ा नहीं होती, लेकिन मैं भी अपने ह्रदय में तुम्हारे लिए पीड़ा उत्पन्न करके ही छोडूंगा। [4]

श्री बिंदु जी कहते हैं कि यदि मेरे आँखों में आँसु अभी जीवित है तो जिस ह्रदय से आपने मुझे निकाल फेंका है, उस ह्रदय पर कब्ज़ा करके ही छोडूंगा। [5]