(राग मल्हार)
भवन मेरे कैसे लागत नीके ।
तब ही लाल आवत यह मंदिर खरे भावते जी के ।। [1]
कसूमी पाग खुकि रही नीकी विकसित नन्द किसोर ।
तेसी ये श्यामघन घटा जुर आई अरु बोलत बनमोर ।। [2]
तादिन बिधनां भली बनाई अकेली ही घर माँझ ।
श्रीविठ्ठल गिरिधरन लाल सो बातन ही भई साँझ ।। [3]
- श्री विट्ठल दास
कैसा अद्भुत आज मेरा भवन दिखाई दे रहा है क्यूँकि आज श्री श्याम सुंदर स्वयं मेरे घर के मंदिर में विराज रहे हैं जो मेरे हृदय को अत्यंत भा रहे हैं । [1]
श्री कृष्ण एक सुंदर गुलाबी पगड़ी से सुशोभित हैं एवं रूप नव नवायमान किशोर है। तत्काल घने बादलों ने आकाश को घेर लिया और वन में मोर भी बोलने लगे। [2]
वाह विधाता, क्या आज का सौभाग्य बनाया है मेरा, क्योंकि मैं घर पर भी अकेली ही हूँ ! श्री विट्ठल दास जी कहते हैं कि श्याम सुंदर से प्रेम की बातें करते करते न जाने कब श्याम [साँझ] हो गयी, पता ही नहीं चला । [3]
भवन मेरे कैसे लागत नीके ।
तब ही लाल आवत यह मंदिर खरे भावते जी के ।। [1]
कसूमी पाग खुकि रही नीकी विकसित नन्द किसोर ।
तेसी ये श्यामघन घटा जुर आई अरु बोलत बनमोर ।। [2]
तादिन बिधनां भली बनाई अकेली ही घर माँझ ।
श्रीविठ्ठल गिरिधरन लाल सो बातन ही भई साँझ ।। [3]
- श्री विट्ठल दास
कैसा अद्भुत आज मेरा भवन दिखाई दे रहा है क्यूँकि आज श्री श्याम सुंदर स्वयं मेरे घर के मंदिर में विराज रहे हैं जो मेरे हृदय को अत्यंत भा रहे हैं । [1]
श्री कृष्ण एक सुंदर गुलाबी पगड़ी से सुशोभित हैं एवं रूप नव नवायमान किशोर है। तत्काल घने बादलों ने आकाश को घेर लिया और वन में मोर भी बोलने लगे। [2]
वाह विधाता, क्या आज का सौभाग्य बनाया है मेरा, क्योंकि मैं घर पर भी अकेली ही हूँ ! श्री विट्ठल दास जी कहते हैं कि श्याम सुंदर से प्रेम की बातें करते करते न जाने कब श्याम [साँझ] हो गयी, पता ही नहीं चला । [3]

