कुम्भ (कलश) का सम्बन्ध अमृत कलश से है। जब अमृत कलश के लिए देवता और दैत्यों में युद्ध हुआ, तब अमृत कलश से पृथ्वी पर ४ स्थानों पर अमृत की कुछ बूँदें गिरी, जिसमे प्रयाग राज, हृषिकेश, नाशिक और उज्जैन है। तब से इन चार स्थानों पर उसी तिथि पर कुम्भ होता है।
मत्स्य पुराण के अनुसार जब भगवान के प्रिय पार्षद श्री गरुड़ जी कद्रू से अपनी माता के प्राणों की रक्षा के लिए अमृत कलश को ले जा रहे थे, तब गरुड़ जी वृन्दावन में यमुना के तट पर कालिया दह पर एक कदम्ब के वृक्ष पर विश्राम के लिए रुके। विश्राम के समय कलश से अमृत की कुछ बूँदें वृक्ष पर तथा यमुना जी के तट पर गिरे। तब से वृन्दावन में भी कुम्भ का शुभारम्भ हुआ।
श्री गरुड़ जी परम वैष्णव हैं, उनके द्वारा अमृत कलश वृन्दावन में आया, इसी कारण वृन्दावन कुम्भ को वैष्णव कुम्भ कहते हैं।
स्थान:
वृंदावन में केशी घाट पर कुंभ पर्व आयोजित होता है।
मत्स्य पुराण के अनुसार जब भगवान के प्रिय पार्षद श्री गरुड़ जी कद्रू से अपनी माता के प्राणों की रक्षा के लिए अमृत कलश को ले जा रहे थे, तब गरुड़ जी वृन्दावन में यमुना के तट पर कालिया दह पर एक कदम्ब के वृक्ष पर विश्राम के लिए रुके। विश्राम के समय कलश से अमृत की कुछ बूँदें वृक्ष पर तथा यमुना जी के तट पर गिरे। तब से वृन्दावन में भी कुम्भ का शुभारम्भ हुआ।
श्री गरुड़ जी परम वैष्णव हैं, उनके द्वारा अमृत कलश वृन्दावन में आया, इसी कारण वृन्दावन कुम्भ को वैष्णव कुम्भ कहते हैं।
स्थान:
वृंदावन में केशी घाट पर कुंभ पर्व आयोजित होता है।

