प्यारी सहजहिं मृदु मुसिक्याइ - श्री रसिक सखी

प्यारी सहजहिं मृदु मुसिक्याइ - श्री रसिक सखी

प्यारी सहजहिं मृदु मुसिक्याइ मोहन बस करे ।
जब अनुराग भरी ढरि हित सौं विवस भये अंकों भरे ।। [1]
मानत भाग्य धन्य धन्य हमहीं आजु प्रिया अपने करे । 
ललित केलि निसि बासर विहरत रसिक सखी के हिये अरे ।। [2]
- श्री रसिक सखी

श्री प्रिया जी ने अपनी सहज मृदु मुस्कान से ही मोहनलाल को बस में कर लिया है । अनुराग में भर जब वे उन्हें सुख देने के लिए ढुरकती हैं तो प्रेम-विवश लाल उन्हें अंकों में भर लेते हैं । [1] 

वह अहोभाग्य मानते हैं कि आज श्रीप्रियाजी ने मुझे अपना बना लिया है । अहर्निश केलि-विलास करती यह रसमय जोड़ी रसिक सखी के हृदय-निकुंज में विराज रही है। [2]