तो सी तुही हरिदास दुलारी।
तेरी सरि दूजौ नहिं कोई तेरेई रस बस कुंज बिहारी ।। [1]
तेरौ रूप कहत नहिं आवै तैसीये तेरी प्रीति महा री ।
तैसीये ललित केलि सुखरासी रसिकसिरोमनि प्रान अधारी ।। [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (55)
हे प्रानजीवनघन, श्री हरिदासी जी की प्राण प्यारी श्री राधा जू ! आपके समान एकमात्र आप ही हैं ! स्वयं श्री कुंजबिहारी लाल जू आपके प्रेसरस में सतत विवश हुये रहते हैं । आपकी समानता कोई कैसे ही कर सकता है । [1]
हे प्रिया जी [श्री राधा जू], आपका अद्भुत रूप सौंदर्य कहने में ही नहीं आता है, वैसे ही आपकी महाप्रीति भी अद्भुत है । श्री ललित किशोरी देव जी कहते हैं उसी प्रकार आपकी केली भी अति शोभायुक्त एवं गोपनीय है जो रसिक शिरोमणि ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी के प्राणों का एक मात्र आधार है । [2]

