राधाकेलि कलासु साक्षिणि कदा वृन्दावने पावने, वत्स्यामि स्फुटमुज्वलाद्भुत रसे प्रेमैक-मत्ताकृति: ।
तेजो-रूप निकुञ्ज एव कलयन्नेत्रादि पिण्डस्थितं, ता दृक्स्वो चित दिव्य कोमल वपुः स्वीयं समालोकये ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (266)
मैं कब प्रेम-विवशाकृति होकर श्री राधा-केलि के साक्षी प्रकट उज्ज्वल-अद्भुत-रस-पूर्ण एवं पवित्र वृन्दावन में निवास करूँगी? तथा नेत्र-पिण्डों में स्थित तेजोमय निकुञ्ज की भावना करती हुई उसी के अनुसार उपयोगी अपने कोमल वपु का कब अवलोकन करूंगी?
तेजो-रूप निकुञ्ज एव कलयन्नेत्रादि पिण्डस्थितं, ता दृक्स्वो चित दिव्य कोमल वपुः स्वीयं समालोकये ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (266)
मैं कब प्रेम-विवशाकृति होकर श्री राधा-केलि के साक्षी प्रकट उज्ज्वल-अद्भुत-रस-पूर्ण एवं पवित्र वृन्दावन में निवास करूँगी? तथा नेत्र-पिण्डों में स्थित तेजोमय निकुञ्ज की भावना करती हुई उसी के अनुसार उपयोगी अपने कोमल वपु का कब अवलोकन करूंगी?

